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बुलंदशहर: अंतर्राष्ट्रीय उर्दू दिवस पर बुलंदशहर में गूँजी उर्दू की मिठास — “उर्दू मुहब्बत और भाईचारे की ज़बान है” : हाजी खुर्शीद आलम ‘राही’

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अल्लामा इक़बाल के जन्मदिवस पर बज़्मे खुलूस ओ अदब संस्था के तत्वावधान में अल्मास पब्लिक स्कूल, भूड़ (बुलंदशहर) में मुशायरे का आयोजन हुआ। शायरों ने उर्दू को मोहब्बत और एकता की भाषा बताते हुए इक़बाल की शायरी को नमन किया।


बुलंदशहर:  विश्व प्रसिद्ध शायर अल्लामा इक़बाल के जन्मदिवस और अंतर्राष्ट्रीय उर्दू दिवस के अवसर पर रविवार को साहित्यिक संस्था ‘बज़्मे खुलूस ओ अदब’ के तत्वावधान में अल्मास पब्लिक स्कूल, भूड़ में एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में शायरों एवं बुद्धिजीवियों ने अल्लामा इक़बाल की शायरी, व्यक्तित्व और साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

संस्था और मुशायरे के अध्यक्ष हाजी खुर्शीद आलम ‘राही’ ने कहा — “उर्दू भाषा जैसी मिठास अन्य किसी भाषा में नहीं है। यह मुहब्बत और भाईचारे की ज़बान है। हमें इसके विकास और प्रसार के लिए मिलजुलकर प्रयास करना चाहिए।”

संस्था के संस्थापक ऐंन मीम कौसर ने कहा कि “उर्दू विदेशी भाषा नहीं बल्कि भारत की मिट्टी में जन्मी भाषा है। आनंद नारायण मुल्ला, रघुपति सहाय ‘फिराक़’, पंडित गुलज़ार देहलवी और मुंशी प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने इसे नई ऊँचाइयाँ दीं। उर्दू को राष्ट्रीय एकता की भाषा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।”

वरिष्ठ शायर और अधिवक्ता इरशाद अहमद शरर ने याद दिलाया कि “हिंदुस्तान का प्रसिद्ध तराना ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’ अल्लामा इक़बाल की ही देन है।”
संस्था के सचिव मक़सूद जालिब ने कहा कि “इक़बाल की शायरी इंसानी जज़्बातों का आईना है — उनकी नज़्में ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी’, ‘शिकवा’ और ‘जवाब-ए-शिकवा’ इसका प्रमाण हैं।”

दूसरे सत्र में शायरों ने अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से समां बाँध दिया।
युवा शायर यूसुफ सहराई ने पढ़ा —
“इक धमाका सा दिल में होता है, जब निगाहों के तार मिलते हैं।”

ऐंन मीम कौसर के इस शेर पर खूब दाद मिली —
“करके देखिये ज़रा उर्दू में गुफ़्तगू, उल्फत महक उठेगी अदावत के दरमियाँ।”

लियाक़त कमालपुरी ने कहा —
“शाइस्तगी सिखाती है उर्दू की गुफ्तगू, जैसे गुलाब हो कोई गुलशन में खूबरू।”

मोमिन अकबरपुरी ने दुआ माँगी —
“धड़कन को कलम, दिल को कलमदान बना दे, अल्लाह तू इंसान को इंसान बना दे।”

मक़सूद जालिब ने अपनी पंक्तियों से श्रोताओं का दिल जीत लिया —
“कितनी शीरीं है ये ज़बाँ उर्दू, जिसने आलम में रुतबा पाया है,
अहले उर्दू को नाज़ है जिस पर, आलमी यौमे उर्दू आया है।”

हापुड़ की शायरा मुशर्रफ चौधरी ने दर्द भरी पंक्तियाँ पेश कीं —
“पहले जैसा ज़माना नहीं है, अब कहीं आब ओ दाना नहीं है,
थक के लौटी हूँ मैं मुदत्तों में, अब कहीं आना-जाना नहीं है।”

फसीह चौधरी ने कहा —
“कोई आये मेरी आँखों पे हथेली रख दे, राह तकते हुए पथरा गयीं आँखें मेरी।”

कार्यक्रम में एडवोकेट इरशाद अहमद शरर, अर्सलान और अन्य शायरों ने भी अपनी रचनाओं से माहौल को रंगीन किया।
अंत में आयोजक ऐंन मीम कौसर ने सभी उपस्थित अतिथियों, शायरों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया।


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