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सिकंदराबाद: दशहरे के दिन नहीं होता रावण दहन, चौदस को जलाया जाता है पुतला — परंपरा के पीछे है यह अनोखी कथा

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सिकंदराबाद में दशहरे के दिन नहीं होता रावण दहन। यहां चौदस के दिन जलाया जाता है पुतला। कहा जाता है, मंदोदरी ने यहीं रावण को जीवित करने की तपस्या की थी।


सिकंदराबाद: देशभर में जहां दशहरे के दिन रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, वहीं बुलंदशहर ज़िले के सिकंदराबाद नगर में दशहरे के दिन रावण दहन नहीं किया जाता। यहां सदियों पुरानी परंपरा है कि रावण का पुतला चार दिन बाद, यानी चौदस के दिन जलाया जाता है।

रामलीला कमेटी के प्रभारी अरविंद दीक्षित बताते हैं कि इस परंपरा के पीछे एक धार्मिक कथा जुड़ी है। मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, तो उसकी पत्नी मंदोदरी अपने पति का शरीर लेकर सिकंदराबाद के किशन तालाब पहुंचीं। कहा जाता है कि रावण की नाभि में अमृत कुंड था, इसलिए मंदोदरी को विश्वास था कि वह पुनर्जीवित हो सकता है। उन्होंने चार दिन तक यहीं तपस्या की, लेकिन जब उनका प्रयास असफल रहा तो उन्होंने यहीं उसका दाह संस्कार किया।

 

इसी वजह से सिकंदराबाद में दशहरे के दिन रावण को “जिंदा रावण” माना जाता है और उसका पुतला दहन चार दिन बाद किया जाता है।

कहानीकार ने भी किया उल्लेख

कहानीकार गौरव भटनागर ने अपनी रचना ‘अभी रावण मरा नहीं’ में इस कथा का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि मंदोदरी के पिता मयासुर, जो ज्योतिष और वास्तुशास्त्र के ज्ञाता थे, के पास मृत शरीर को जीवित करने वाली औषधि थी। लंका से मेरठ जाते वक्त मंदोदरी रास्ता भटक गईं और सिकंदराबाद में ही तपस्या आरंभ की। चार दिन बाद जब वह विफल रहीं, तो उन्होंने रावण के शरीर का दाह संस्कार किया।

बिसरख में भी नहीं होता दहन

सिकंदराबाद से कुछ दूरी पर स्थित बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली माना जाता है। यहां दशहरे के दिन न तो रामलीला होती है और न ही रावण दहन। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कई साल पहले यहां रामलीला के दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद इसे अशुभ मानते हुए आयोजन बंद कर दिया गया। आज भी बिसरख में राम और रावण दोनों की पूजा होती है, लेकिन दहन नहीं किया जाता।

आस्था से जुड़ी लोककथा

सिकंदराबाद की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि लोककथा और इतिहास का संगम भी है। यहां रावण दहन सिर्फ बुराई के अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी कथा से जुड़ा है जो सदियों से इस नगर की पहचान बन चुकी है।


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