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सिकंदराबाद: ड्रीम प्रोजेक्ट बना उपेक्षा का शिकार, नष्ट हो गई कान्हा कावड़ उपवन वाटिका

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बुलंदशहर के सिकंदराबाद में ड्रीम प्रोजेक्ट कान्हा कावड़ उपवन वाटिका की हालत दयनीय। देखरेख के अभाव में पौधे नष्ट, ड्रीम योजना बनी उपेक्षा का शिकार।

सिकंदराबाद : गुलावठी रोड स्थित भाराना मोड़ के पास लगभग 5-6 वर्ष पहले कांवड़ यात्रियों की सुविधा और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उस समय के जिलाधिकारी रविंद्र कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में कान्हा कावड़ उपवन वाटिका का उद्घाटन किया गया था। गाज़ीपुर ग्राम पंचायत की सवा हेक्टेयर जमीन पर बने इस उपवन में रुद्राक्ष, आम, शहतूत, जामुन, नीम, पीपल और अर्जुन जैसे लगभग 6,500 छायादार और फलदार पौधे रोपे गए थे।

ड्रीम प्रोजेक्ट बना उपेक्षा का शिकार, नष्ट हो गई कान्हा उपवन वाटिका ड्रीम प्रोजेक्ट बना उपेक्षा का शिकार, नष्ट हो गई कान्हा उपवन वाटिका

हालांकि, देखरेख के अभाव में यह उपवन अब पूरी तरह नष्ट हो चुका है। घास-फूस से भर चुकी यह जगह अब प्रशासनिक उदासीनता की मिसाल बनकर रह गई है।

ड्रीम प्रोजेक्ट बना उपेक्षा का शिकार, नष्ट हो गई कान्हा उपवन वाटिका

पुनः प्रयास भी रहे असफल

प्रोजेक्ट के अगले वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक बार फिर कान्हा उपवन को संवारने की कोशिश की गई। ग्राम प्रधान अनुज यादव और ग्राम सचिव बिजेंदर यादव के नेतृत्व में वन विभाग के सहयोग से फिर से छह हजार पौधे रोपे गए। इनमें से पांच हजार पौधे डीएम रविंद्र कुमार द्वारा भिजवाए गए थे।

ड्रीम प्रोजेक्ट बना उपेक्षा का शिकार, नष्ट हो गई कान्हा उपवन वाटिका

वाटिका की देखरेख के लिए एक कर्मचारी की तैनाती तथा वन विभाग द्वारा पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात भी हुई थी। यहां तक कि वाटिका में बोरिंग कराने का भी विचार सामने आया, ताकि पौधों के लिए स्थायी जल व्यवस्था हो सके। लेकिन इन सभी योजनाओं और प्रयासों के बावजूद आज कान्हा उपवन पूरी तरह से वीरान हो चुका है।

ड्रीम प्रोजेक्ट बन सकता था आदर्श शरण स्थल

कांवड़ यात्रा की भीड़ और यात्रियों की थकान को देखते हुए यह वाटिका एक आदर्श विश्राम स्थल बन सकती थी। यदि समय रहते इसकी देखभाल की जाती, तो यह पर्यावरणीय संरक्षण के साथ-साथ धार्मिक यात्रियों को भी राहत देता।

कागज़ों तक सीमित रह गई हरियाली

हर वर्ष हजारों पौधे लगाने का दावा किया जाता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि ये सब प्रयास केवल कागजों पर ही रह जाते हैं। आज की स्थिति में न तो पुराने पौधे जीवित हैं और न ही कोई संरचनात्मक विकास दिखता है।

स्थानीय लोग अब इस परियोजना को फिर से संवारने की मांग कर रहे हैं, ताकि यह पर्यावरणीय और धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से पुनर्जीवित हो सके।


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