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Kargil Vijay Diwas 2024: योगेंद्र यादव ने सीने पर कैसे 17 गोलियां खाकर बचाई टाइगर हिल

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कारगिल की जंग को कौन भूल सकता है,जब देश की सीमा में घुस आए दुश्मन को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना के जाबांजों ने अपनी जान की बाजी लगा दी I 26 जुलाई, 1999 को इस जंग में भारत की विजय का ऐलान किया गया और कारगिल की चोटियों पर शान से तिरंगा लहराने लगा. उसी जीत की याद में हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है. कारगिल युद्ध के कई हीरो रहे, इन्हीं में से एक हैं परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव, जिन्होंने एक, दो नहीं, 17 गोलियां खाईं लेकिन दुश्मन से लड़ते रहे और टाइगर हिल को फतह कर लिया. उन्हें हीरो ऑफ टाइगर हिल कहा जाता है.

5 जुलाई को 18 ग्रनेडियर्स के 25 सैनिक फिर आगे बढ़े। पाकिस्तानियों ने उन पर ज़बरदस्त गोलीबारी की. पाँच घंटे तक लगातार गोलियाँ चलीं। 18 भारतीय सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। अब वहाँ सिर्फ़ 7 भारतीय सैनिक बचे थे। ‘द ब्रेव’ लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, “साढ़े ग्यारह बजे करीब 10 पाकिस्तानी ये देखने नीचे आए कि भारतीय सैनिक ज़िंदा बचे हैं या नहीं। हर भारतीय सैनिक के पास सिर्फ़ 45 राउंड गोलियाँ बची थीं। उन्होंने उन्हें पास आने दिया। उन लोगों ने क्रीम कलर के पठानी सूट पहन रखे थे। जैसे ही वो उनके पास आए सातों भारतीय सैनिकों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी” उनमें से एक थे बुलंदशहर के रहने वाले 19 साल के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव.वे याद करते हैं, “हमने पाकिस्तानियों पर बहुत पास से गोली चलाई और उनमें से आठ को नीचे गिरा दिया, लेकिन उनमें से दो लोग भागने में सफल हो गए. उन्होंने ऊपर जाकर अपने साथियों को बताया कि नीचे हम सिर्फ़ सात हैं.”

लाशों पर भी गोलियाँ चलाईं

योगेंद्र बताते हैं, “थोड़ी देर में 35 पाकिस्तानियों ने हम पर हमला किया और हमें चारों तरफ़ से घेर लिया। मेरे सभी छह साथी मारे गए। मैं भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों की लाशों के बीच पड़ा हुआ था। पाकिस्तानियों का इरादा सभी भारतीयों को मार डालने का था इसलिए वे लाशों पर भी गोलियां चला रहे थे.”

“मैं अपनी आँखें बंद कर अपने मरने का इंतज़ार करने लगा। मेरे पैर, बाँह और शरीर के दूसरे हिस्सों में में करीब 17 गोलियाँ लगीं थीं। लेकिन मैं अभी तक ज़िंदा था ” इसके बाद जो हुआ वह किसी फ़िल्मी दृश्य से कम नाटकीय नहीं था।

योगेंद्र बताते हैं, “पाकिस्तानी सैनिकों ने हमारे सारे हथियार उठा लिए. लेकिन वो मेरी जेब में रखे ग्रेनेड को नहीं ढूँढ़ पाए. मैंने अपनी सारी ताकत जुटा कर अपना ग्रेनेड निकाला उसकी पिन हटाई और आगे जा रहे पाकिस्तानी सैनिकों पर फेंक दिया.”

“वो ग्रेनेड एक पाकिस्तानी सैनिक के हेलमेट पर गिरा. उसके चिथड़े उड़ गए. मैंने एक पाकिस्तानी सैनिक की लाश के पास पड़ी हुई पीका रायफ़ल उठा ली थी. मेरी फ़ायरिंग में पाँच पाकिस्तानी सैनिक मारे गए.”

बुलंदशहर में पैदा हुआ देश का परामक्रमी लाल

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में पैदा हुए योगेंद्र सिंह यादव की बहादुरी का किस्‍सा ऐसा है, जिसे सुनकर हिंदुस्‍तान तो क्‍या दुश्‍मन देश के भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। योगेन्द्र सिंह यादव को साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल कब्‍जा जमाने के लिए दुश्मन के तीन बंकरों को तबाह करने का जिम्‍मा सौंपा गया था। सीने में 17 गोलियां लगने के बाद भी उन्‍होंने न सिर्फ अपनी जिम्‍मेदारी निभाई, बल्‍क‍ि दुश्‍मनों के दांत खट्टे करते हुए टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया।

 

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